ऑक्सीजन सिस्टम की विफलता या प्रशासनिक संवेदनहीनता?

डिंडौरी जिला अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यह सवाल सिर्फ एक मरीज की मौत का नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था का है, जिस पर आम नागरिक आखिरी उम्मीद लेकर भरोसा करता है। रायपुर निवासी 46 वर्षीय रविंद्र कुमार मरावी की मौत ने सरकारी अस्पतालों की तैयारियों, जवाबदेही और मानवीय संवेदनाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है।परिजनों के अनुसार गंभीर हालत में भर्ती मरीज को समय रहते समुचित एंबुलेंस और पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं कराई गई। हालत नाजुक होने के बावजूद 108 जैसी लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस के बजाय जननी एक्सप्रेस से रेफर किया जाना अपने आप में गंभीर लापरवाही का संकेत है। उससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि एंबुलेंस में उपलब्ध ऑक्सीजन सिलेंडरों को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं
एक ओर चालक के कथन, दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन का दावा।
यदि ऑक्सीजन रास्ते में समाप्त हुई, तो यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि सिस्टम की घोर विफलता है। सवाल यह है कि रेफर करते समय ऑक्सीजन की मात्रा, दूरी और मरीज की स्थिति का आकलन क्यों नहीं किया गया? क्या यह पहली बार है, या ऐसी लापरवाहियाँ अब सामान्य हो चली हैं? मरीज की मौत के बाद परिजनों का अस्पताल के बाहर सड़क पर बैठकर प्रदर्शन करना, प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाना, इस बात का प्रमाण है कि भरोसा टूट चुका है। और जब आक्रोशित परिजन ड्यूटी डॉक्टर से संवाद करना चाहते हैं, तब एक घंटे तक उनका इंतजार कराया जाना व्यवस्था की संवेदनहीनता को और उजागर करता है। स्वास्थ्य सेवाएं केवल भवन, बेड और मशीनों का नाम नहीं होतीं, बल्कि जिम्मेदारी, तत्परता और मानवीय संवेदना का भी दूसरा नाम हैं। यदि समय रहते ऑक्सीजन उपलब्ध होती, यदि सही एंबुलेंस का चयन किया जाता, तो शायद आज एक परिवार का चिराग बुझने से बच सकता था। प्रशासन को चाहिए कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कराए। दोष चाहे डॉक्टर का हो, प्रबंधन का या सिस्टम का—जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई और रविंद्र मरावी व्यवस्था की लापरवाही का शिकार न बने।











