आत्म शुद्धि की यज्ञीय प्रक्रिया का नाम दशहरा: श्री भगवान वेदांताचार्य
विजय के गौरव में नियोजित युद्ध की पूर्णता ही दशहरा : श्री भगवान वेदांताचार्य

कीर्ति अहीरवाल जिला ब्यूरो दमोह
दशहरा के बारे में हम आमतौर पर यही बातें जानते हैं कि श्रीराम ने रावण का वध किया या माँ दुर्गा ने महिषासुर को मारा, पर इसके पीछे कई गहरे रहस्य छुपे है जिन्हें वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक रहस्य जो कि प्राचीन तथ्य पर आधारित हैं “दशहरा” केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि मन के 10 विकारों पर विजय है । मनुष्य के शरीर में दश इंद्रिय है । प्रत्येक इंद्रिय के अपने गुण अपने दोष भी हैं , हम दोषों की बात कर रहे है जिन्हें काम (वासना),क्रोध (गुस्सा),लोभ,(लालच),मोह (आसक्ति), अहंकार (घमंड), मत्सर(ईर्ष्या), मद(अहंभाव), स्वार्थ,(स्वहित)द्वेष (शत्रुता), आलस्य (सुस्ती) नाम से जानते है ये साधक के अति सूक्ष्म शत्रु है । जो हमें सफलता प्राप्त नहीं करने देते । शास्त्रों में कहा गया है कि रावण के दस सिर वास्तव में इन्हीं के प्रतीक थे जो अहंकार से जुड़े थे । जब श्रीराम रावण को मारते हैं, तो यह प्रतीक होता है स्वयं के भीतर इन दस विकारों को जीतने का इसलिए “दशहरा” में हरण निहित है , जो सीता हरण से प्रारंभ हुआ शक्ति का हरण यह केवल बाहरी राक्षस पर विजय नहीं, बल्कि अंतरात्मा की विजय का उत्सव है। जो शक्ति संपन्नता देती है उसे साधना से प्राप्त किया जाता है यह वाणी कथनात्मक रूप से श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी के साथ ग्राहय चिंतन है जहां वे इस से जुड़ी दूसरी बात बताते हुए कहते है कि शमी वृक्ष का रहस्य भी दशहरा से जुड़ा है पर शमी (खिजड़ी) वृक्ष की पूजा का कारण केवल परंपरा नहीं है। महाभारत के अनुसार, पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और विजयादशमी के दिन उन्हें निकालकर युद्ध में गए थे, तब शमी की पूजा को शक्ति और विजय प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।शमी के पत्ते “स्वर्ण पत्र” (सोने के समान शुभ) माने जाते हैं। इसलिए इन्हें एक-दूसरे को देकर समृद्धि और सौभाग्य की कामना की जाती है। यद्यपि समय ने इस परम्पर की सीमित कर दिया और लोग इसे भुला चुके है रावण दहन से लेकर पांडवों के महाभारत तक असल में युद्ध आत्मशुद्धि की यज्ञ-प्रक्रिया हैपुराने ग्रंथों में रावण दहन को केवल नाटक नहीं, बल्कि एक मानसिक यज्ञ भी बताया गया है। यह “आत्मशुद्धि” का प्रतीक है।इसी कारण से दशहरा को “नवजीवन” आरंभ करने का दिन भी माना जाता है। श्री भगवान पुनः एक दार्शनिक विवेचना में कहते है कि यह “सूर्य की विजय” का भी दिन है । इस बात पर किन्हीं विद्वानों का ध्यान जाता है लेकिन बात अकाट्य सत्य है प्राचीन वैदिक दृष्टिकोण से दशहरा वह दिन है जब सूर्य ने अंधकार पर विजय प्राप्त की और दियाली या दीपक के प्रतिनिधित्व के योग से अंधकार का हरण कर लिया इसका मतलब है कि अंधकार पर प्रकाश की विजय का आरंभ यही से हुआ इसलिए दिया तले अंधेरा बाली कथा प्रचलित है । इसे “ऊर्जा की जीत” और “प्रकाश के युग” की शुरुआत भी माना जाता है। विजयादशमी यज्ञ की पूर्णता और युद्ध का शंख नाद है जो शुभता का संकेत लिए है । नए अभियानों को मूर्त रूप देने की शुरुआत है ।इस दिन को सर्वसिद्ध भी माना गया है। इसलिए आज से लोग नया व्यापार, नये वाहन खरीदना, घर का निर्माण कार्य शुरू करना या शस्त्र आदि पूजा करते हैं।जिसमें रण में हरण की विषमता को उजागर करने वाले युद्ध का आगाज़ भी समाहित रहा ।
यह बहुत गहरा और ज्ञानवर्धक विषय है । जिसमें पंच ज्ञान और पांच कर्म इंद्रिय दोनों मिलकर दस अपना ही प्रतिनिधित्व कर बल ऊर्जा और स्वाभिमान की रचना में सहयोग देती है । जिससे विजय प्राप्त कर राष्ट्रीय उद्देश्यों की भूमिका में शक्ति संपन्नता साथ रहे ।।










