आखिर इंजीनियर पर लगे कमीशन के आरोपों पर क्यों नहीं हो रही कार्रवाई?
जिला प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल, एक माह बाद भी जांच अधूरी

डिंडौरी। जनपद पंचायत डिंडौरी अंतर्गत ग्राम पंचायत तेन्दुमेर मोहतरा में सामने आए कथित 10 प्रतिशत कमीशन मामले ने जिले की पंचायत व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायत सचिव द्वारा अपने ही विभाग के उपयंत्री पर कमीशन लेने का आरोप लगाए जाने के बाद जिला पंचायत सीईओ ने तत्काल जांच के आदेश तो दिए, लेकिन आदेश जारी होने के लगभग एक माह बाद भी न जांच रिपोर्ट सामने आई और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई होती दिखाई दी। ऐसे में अब लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इंजीनियर पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई करने में जिला प्रशासन परहेज क्यों कर रहा है।
जिले के जिम्मेदारों पर उठे सवाल
मामले को लेकर जब जिले के जिम्मेदारों से जब चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि वीडियो में केवल कमीशन मांगने की बात कही गई है, जिसके आधार पर सीधे कार्रवाई नहीं की जा सकती। क्योंकि कथित स्टिंग वीडियो में पंचायत सचिव कमल सिंह पट्टा साफ तौर पर यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि संबंधित उपयंत्री 10 प्रतिशत कमीशन लेता है और कथित रूप से यह राशि ऊपर तक पहुंचाई जाती है। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि वीडियो में स्पष्ट रूप से गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो फिर जांच प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों है? क्या प्रशासन सिर्फ औपचारिक जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहता है?
तीन दिन में रिपोर्ट सौंपने के थे निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ ने तत्काल दो सदस्यीय जांच दल गठित किया था। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि तीन दिवस के भीतर पूरे मामले की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए, ताकि आरोपों की सच्चाई सामने लाई जा सके। लेकिन तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। करीब एक माह बीत जाने के बावजूद संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होना अब प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिला पंचायत सीईओ स्वयं मामले को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दे चुके हैं, तो फिर रिपोर्ट सार्वजनिक करने में देरी क्यों हो रही है।
पंचायत व्यवस्था में भ्रष्टाचार की आशंका
ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए शासन पंचायतों को करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध कराता है। इन पैसों से सड़क, नाली, भवन, पेयजल और अन्य विकास कार्य कराए जाते हैं। लेकिन यदि निर्माण कार्यों में कमीशनखोरी हावी हो जाए, तो विकास कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होना तय माना जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कमीशन के कारण निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है और योजनाओं का पूरा लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाता। ऐसे में यदि किसी पंचायत सचिव द्वारा स्वयं अपने विभागीय अधिकारी पर कमीशन लेने के आरोप लगाए जाते हैं, तो यह मामला और अधिक गंभीर हो जाता है।
कार्रवाई नहीं होने से उठ रहे बड़े सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार एक ओर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर सख्ती की बात करती है, वहीं दूसरी ओर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई नहीं होना कई शंकाओं को जन्म दे रहा है। लोगों का कहना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं रहेगा बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे में फैली कथित भ्रष्ट व्यवस्था की ओर संकेत करेगा। वहीं यदि आरोप गलत हैं, तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लानी चाहिए। लेकिन जांच में लगातार हो रही देरी से लोगों के मन में यह धारणा बन रही है कि कहीं न कहीं मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।
अब जांच रिपोर्ट का इंतजार
मामले को लेकर जिले में चर्चाओं का दौर जारी है। जांच रिपोर्ट जल्द सार्वजनिक की जाए और यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो। लोगों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों में समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो शासन की भ्रष्टाचार विरोधी नीति पर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।










