जिला पंचायत सीईओ के आदेशों की अवहेलना! 3 दिन में सौंपना था जांच प्रतिवेदन, एक माह बाद भी नहीं हुई कार्रवाई 10 प्रतिशत कमीशन मामले में जांच ठंडे बस्ते में, अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

जिला पंचायत सीईओ के आदेशों की अवहेलना!

3 दिन में सौंपना था जांच प्रतिवेदन, एक माह बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

10 प्रतिशत कमीशन मामले में जांच ठंडे बस्ते में, अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

डिंडौरी। जनपद पंचायत डिंडौरी अंतर्गत ग्राम पंचायत तेन्दुमेर मोहतरा में सामने आए कथित 10 प्रतिशत कमीशन मामले ने एक बार फिर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ द्वारा दो सदस्यीय जांच टीम गठित कर तीन दिवस के भीतर जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आदेश जारी होने के लगभग एक माह बीत जाने के बाद भी न तो जांच रिपोर्ट सामने आई और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई होती दिखाई दे रही है। ऐसे में जिले के अधिकारियों की कार्यशैली और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत तेन्दुमेर मोहतरा में पंचायत सचिव कमल सिंह पट्टा का एक कथित स्टिंग सामने आया था, जिसमें उन्होंने अपने ही पंचायत के उपयंत्री पर 10 प्रतिशत कमीशन लेने का गंभीर आरोप लगाया था। स्टिंग में सचिव द्वारा यह दावा किया गया कि उपयंत्री का कमीशन तय है और कथित रूप से यह राशि ऊपर तक पहुंचाई जाती है। इस खुलासे के बाद पंचायत व्यवस्था में हड़कंप मच गया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ ने तत्काल संज्ञान लेते हुए दो सदस्यीय जांच दल का गठन किया था। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि तीन दिन के भीतर पूरे मामले की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए, ताकि आरोपों की सच्चाई सामने लाई जा सके। लेकिन तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। करीब एक माह गुजर जाने के बावजूद न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई और न ही संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई की सूचना सामने आई है। इस पूरे मामले को लेकर अब जिला प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब जिला पंचायत सीईओ स्वयं मामले को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दे चुके हैं, तो फिर जांच रिपोर्ट में देरी क्यों हो रही है। लोगों का आरोप है कि यदि इस प्रकार के मामलों में समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और दोषियों के हौसले बुलंद होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए शासन द्वारा पंचायतों को करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाती है। इन पैसों से सड़क, नाली, भवन, पेयजल, सामुदायिक भवन और अन्य विकास कार्य कराए जाते हैं। लेकिन यदि इन कार्यों में कमीशनखोरी हावी हो जाए, तो विकास कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है। लोगों का कहना है कि कमीशन के कारण निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है और योजनाओं का लाभ आम जनता तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। सबसे गंभीर पहलू यह है कि पंचायत सचिव ने स्वयं अपने विभागीय अधिकारी पर कमीशन लेने का आरोप लगाया है। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे में फैले भ्रष्टाचार की ओर संकेत करेगा। वहीं यदि आरोप असत्य हैं, तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन जांच में हो रही देरी से लोगों के मन में कई तरह की शंकाएं जन्म लेने लगी हैं।

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