
न्यायपालिका की गरिमा पर प्रश्न: जब आचरण ही कटघरे में हो, तो जवाबदेही किसकी?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दिनांक 28/10/26 की घटना केवल न्यायाधीश और अधिवक्ताओं के बीच टकराव का विषय नहीं, बल्कि न्यायिक गरिमा, संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर आत्ममंथन का अवसर है। आखिर न्यायालय की साख को ठेस पहुँचाने वाली परिस्थितियाँ बार-बार क्यों उत्पन्न होती हैं? क्या न्यायिक अधिकार के साथ विनम्रता, संवेदनशीलता और आत्मसंयम की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभाई जा रही है? न्यायाधीश का पद संविधान से प्राप्त अधिकार के साथ असाधारण उत्तरदायित्व भी लेकर आता है। संविधान का अनुच्छेद समानता की गारंटी देता है और निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा न्याय व्यवस्था की बुनियाद है। फिर सवाल उठता है—यदि किसी न्यायाधीश के आचरण पर गंभीर आरोप लगें, तो क्या उस पर निष्पक्ष, पारदर्शी और संस्थागत विचार-विमर्श नहीं होना चाहिए?न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं, जैसे अधिवक्ता की स्वतंत्रता न्यायालय की मर्यादा भंग करने का अधिकार नहीं है। जब न्यायालय दूसरों के आचरण की कानूनी कसौटी तय करता है, तो उसके अपने आचरण का मूल्यांकन भी संवैधानिक मर्यादाओं और न्यायिक नैतिकता की कसौटी पर क्यों न हो?न्यायालय की गरिमा केवल उसके भवन, पद और आदेशों में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में दिखाई देती है। आरोपों की सत्यता निष्पक्ष जाँच से तय होनी चाहिए, लेकिन संस्थागत आत्ममंथन से बचना भी समाधान नहीं हो सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—न्याय की प्रतिष्ठा बचाने का दायित्व जिन पर है, यदि उन्हीं के आचरण से उसकी साख पर सवाल उठें, तो जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रभावी व्यवस्था कौन और कैसे लागू करेगा?
एडवोकेट आनंद कुमार श्रीवास्तव











