कागजों में हरी-भरी, जमीन पर सूखी ‘मां की बगिया’,,,,
योजना पर भारी पड़ी प्रशासनिक अनदेखी,

डिंडोरी। राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की मंशा के तहत साल भर पहले शुरू की गई एक बगिया मां के नाम योजना आदिवासी बाहुल्य डिंडोरी जिले में धरातल पर खरा नहीं उतरी है। महिलाओं की आय बढ़ाने के दावों पर प्रशासनिक अनदेखी इतनी हावी पड़ी है कि योजना के तहत कागजों में तंदुरूस्त करार दिये गये पौधे कुछ दिन भी नहीं टिक पाये। घटिया स्तर के प्रदाय पौधे महिलाओं की लाख कोशिशों के बाबजूद पूरी तरह सूख गये हैं। जिसके बाद महिलाएं अब खुद को ठगा महसूस कर रहीं हैं। गौरतलब है कि ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर प्रदान करने के लिए राज्य सरकार द्वारा 15 अगस्त 2025 से प्रदेश में एक बगिया मां के नाम योजना शुरू की गई थी। योजना के तहत प्रति विकासखंड में 100 महिलाओं का बतौर हितग्राही चयन किया गया था। इन महिलाओं की मध्यप्रदेष ग्रामीण आजीविका मिषन के अंतर्गत स्व सहायता समूह की सदस्यता अनिवार्य थी। योजना के तहत एनआरएलएम ने जिले के सात विकास खंडों में 726 महिला हितग्राहियों का चयन किया था। जिसके बाद इन महिलाओं की चयनित भूमि पर पौधों की सुरक्षा के लिहाज से फेंसिंग कराई गई थी और सिंचाई के प्रबंध के दावे किये गये थे। वहीं चयनित 726 महिलाओं को जबलपुर की एक ही नर्सरी से पौधे सप्लाई कराये गये थे। इस दौरान बतलाया गया था कि इन्हीं पौधों से महिलाएं आत्मनिर्भर बनेगी। लेकिन नतीजा बिल्कुल विपरीत रहा, प्रशासनिक जल्दबाजी और अदूरदर्शिता के चलते अप्रैल की भरी गर्मी में प्रदाय किये गये पौधे पनप ही नहीं पाये और मां की बगिया ने दम तोड़ दिया। इसकी वानगी डिंडौरी विकास खंड के माधोपुर, अखडार, नारायणडीह सहित अन्य ग्रामों में देखी जा सकती है।
क्यों नहीं पनप पाये पौधे
महिलाओं के प्रति सरकार की महत्वाकांक्षी इस योजना को फेल करने में अहम योगदान प्रशासन का है। चूंकि प्रशासन ने पौधारोपण मानकों का पालन नहीं किया, और अप्रैल की गर्मी में पौधे सप्लाई किये। जिससे पौधे पनप ही नहीं पाये इसके साथ ही सिंचाई की माकूल व्यवस्था और पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम ना होने से भी पौधों ने दम तोड दिया। इसके साथ ही सप्लायर द्वारा सूखे और बगैर जड़ के पौधों की सप्लाई भी योजना को कटघरे में खड़ा करती है। बताया जाता है कि हितग्राही महिलाओं को इन्हीं पौधों का रोपण करने का दबाव भी बनाया गया था। योजना के प्रावधान के अनुसार चयनित भूमि या आसपास सिंचाई की सुविधा अनिवार्य थी। जिसका चयन के दौरान पालन नहीं किया गया। वर्तमान की स्थिति से साफ है कि आनन-फानन में कागजी लक्ष्य पूरा करने के लिए पौध रोपण की प्रक्रिया पूरी कर दी गई थी।
बगिया की जगह उग गई खरपतवार
जिम्मेदारों ने एक बगिया मां के नाम को मजाक बना कर रख दिया है। शासन की इस महत्वपूर्ण योजना की मैदानी हकीकत यह है कि जिस चयनित हितग्राही की जमीन पर फलदार पौध रोपण के साथ फेंसिंग का दावा किया गया था। अब वहां जमीन में खरपतवार के साथ एक दो पौधों के सूखे ठूंठ ही खड़े दिखाई दे रहे हैं। कुछ बगिया में तो यह ठूंठ भी नदारद है, यहां फेंसिंग और तार योजना को मुंह चिढ़ाते दिख रहे हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष ने जताया था विरोध
गौरतलब है कि योजना के गलत समय पर क्रियान्वयन पर जिला पंचायत अध्यक्ष रूदेश परस्ते ने आपत्ति जताई थी, और विरोध किया था। उन्होंने गर्मी के मौसम में पौधारोपण को रोकने और अमानक पौधे सप्लाई पर भी एतराज जताया था। बावजूद इसके हितग्राही महिलाओं को अप्रैल की भरी गर्मी में ठूंठ नुमा पौधे पकडा दिये गये। अब आलम यह है कि जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड रहे हैं, और योजना के फेल होने का ठीकरा महिला हितग्राहियों के मत्थे मढ़ रहे हैं।
इनका कहना है
किस योजना के तहत लाभ दिया गया है, इस बावद जानकारी नहीं है। गर्मी के दिनों में सूखे पौधे दिये गये थे, जिनका हमारे द्वारा रोपण किया गया था। जो कुछ समय में ही पूरी तरह नष्ट हो गये।
गोमती बाई, अध्यक्ष, मां सरस्वती आजीविका स्व सहायता समूह, माधोपुर
पौधों की सिंचाई जिम्मेदारी स्वयं हितग्राही की है, मेरी जानकारी में सब ठीक है। फोन पर वर्जन वैधानिक नहीं है। जो बात करनी है कार्यालय आकर करें।
अर्पणा पांडे, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, एनआरएलएम डिंडौरी










