
आम आदमी पर कानून का डंडा, अपने अमले पर संरक्षण की छतरी क्यों?
फर्जी दस्तावेज पर आम नागरिक को अपराधी बनाने में प्रशासन की फुर्ती, अधीनस्थों पर आरोप लगते ही जांच की रफ्तार सुस्त!
मैहर। आम आदमी पार्टी के जिला विधि प्रकोष्ठ अध्यक्ष एवं अधिवक्ता आनंद श्रीवास्तव ने जनसुनवाई में सामने आए एक मामले को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि आम व्यक्ति पर आरोप लगते ही प्रशासन अपनी पूरी मशीनरी सक्रिय कर देता है, लेकिन जब सरकारी अमले के किसी व्यक्ति पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, झूठी रिपोर्ट बनाने या शासन को गुमराह करने जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो कार्रवाई की धार अचानक कुंद क्यों हो जाती है ? श्रीवास्तव ने कहा कि “आम आदमी के लिए प्रशासन शेर और अपने अधीनस्थों के लिए ढाल” जैसी स्थिति लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आम नागरिक की कथित गलती का असर उसके पूरे परिवार तक पहुंच जाता है, लेकिन सरकारी व्यवस्था में बैठे व्यक्ति पर गंभीर आरोप सामने आने के बाद भी यदि विभागीय जांच, पत्राचार और कागजी खानापूर्ति का अंतहीन सिलसिला चलता रहे, तो जनता इसे न्याय नहीं, बल्कि संरक्षण क्यों न समझे ? उन्होंने हाल की जनसुनवाई में उस शिकायतकर्ता के साहस को सलाम किया, जिसने कथित रूप से गलत एवं भ्रामक रिपोर्ट तैयार कर जनता को गुमराह किए जाने के मामले में *सीधे अपराधिक जांच और दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई* की मांग रखी। श्रीवास्तव ने कहा कि शिकायतकर्ता ने केवल अपनी लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि उस मानसिकता को चुनौती दी है जिसमें आम नागरिक को प्रशासनिक गलियारों में न्याय के लिए भटकते रहना पड़ता है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि शिकायत का वास्तविक निराकरण करने के बजाय संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य मान लिया जाए, तो फिर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और जनसुनवाई का औचित्य क्या रह जाता है? शिकायतकर्ता की शिकायत की जांच उसी व्यवस्था से कराना, जिस पर शिकायत है, निष्पक्षता पर स्वाभाविक प्रश्न खड़े करता है। श्रीवास्तव ने कहा कि सरकारी कुर्सी किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाती। यदि कोई सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी जानबूझकर गलत दस्तावेज या भ्रामक रिपोर्ट के माध्यम से शासन अथवा नागरिक को गुमराह करता है, तो मामले की निष्पक्ष जांच और दोष सिद्ध होने पर वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि *मैहर में उठी यह आवाज महज एक शिकायत नहीं, बल्कि उस जनआक्रोश की चिंगारी है जो प्रशासनिक जवाबदेही की मांग कर रहा है।* यदि प्रशासन सचमुच जनता का सेवक है, तो उसे यह साबित करना होगा कि कानून की कठोरता आम आदमी के लिए और संरक्षण की नरमी अपने अमले के लिए अलग-अलग नहीं है। जनता को न्याय चाहिए, कागजी रिपोर्ट नहीं; जवाबदेही चाहिए, संरक्षण नहीं।











