सम्मान किसका, योगदान किसका,,जल संचय अभियान में मैदान पर पसीना बहाने वाले अमले की अनदेखी,,,विवादों के बीच संविदा सहायक परियोजना अधिकारी के सम्मान पर उठे सवाल

सम्मान किसका, योगदान किसका,,जल संचय अभियान में मैदान पर पसीना बहाने वाले अमले की अनदेखी,,,विवादों के बीच संविदा सहायक परियोजना अधिकारी के सम्मान पर उठे सवाल

डिण्डौरी। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन द्वारा उत्कृष्ट कार्य के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों को सम्मानित किया गया। इसी क्रम में जिला पंचायत के संविदा सहायक परियोजना अधिकारी राम जीवन वर्मा को जल संचय जन भागीदारी 2.0, जल गंगा संवर्धन अभियान तथा जिला पंचायत के प्रशासनिक कार्यों में उत्कृष्ट कार्य एवं महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अब सवाल उठ रहे हैं कि अभियान में वास्तविक रूप से मैदानी कार्य करने वाले तकनीकी अमले की भूमिका का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि गांव-गांव जाकर जल संरक्षण कार्यों की तकनीकी निगरानी करने वाले उपयंत्री और सहायक यंत्रियों और मैदानी अमले को सम्मान सूची में स्थान क्यों नहीं मिला? भीषण गर्मी और बारिश के बीच इन कर्मचारियों ने लगातार फील्ड में काम किया। ऐसे में अभियान की उपलब्धियों का श्रेय तय करने को लेकर पारदर्शिता जरूरी है।

जिस काम में भूमिका नहीं, उसी का सम्मान?

आरोप है कि राम जीवन वर्मा का जल संचय जनभागीदारी 2.0 अथवा जल गंगा संवर्धन अभियान के मैदानी एवं तकनीकी क्रियान्वयन से प्रत्यक्ष महत्वपूर्ण संबंध नहीं था, बावजूद इसके उन्हें इसी अभियान में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। जबकि भीषण गर्मी और भरी दोपहरी में तकनीकी अमला के साथ-साथ मैदानी अमला पसीना बहाते हुये जिले को देश में अव्वल लाने को लेकर मषक्कत करता रहा। वहीं सहायक परियोजना अधिकारी रामजीवन वर्मा अपने कार्यालय में बैठकर महज औपचारिकता निभा रहे थे। ऐसी दशा में सम्मान के लिए उनके कौन-से कार्य, लक्ष्य और उपलब्धियां आधार बनीं। क्या उनके द्वारा अभियान में कोई विशेष कार्य कराया गया? यदि हां, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

विवादों के बीच महत्वपूर्ण शाखा की जिम्मेदारी

राम जीवन वर्मा को लेकर पूर्व में न्यायिक स्तर पर मामला सामने आ चुका है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के 18 अगस्त 2023 के आदेश में उन्हें सहायक परियोजना अधिकारी, जिला पंचायत डिंडौरी के रूप में उल्लेखित किया गया है। मामले में नियुक्ति की तारीख और जाति प्रमाण-पत्र संबंधी जानकारी का उल्लेख है। यदि उनके मूल निवासी प्रमाण-पत्र अथवा नियुक्ति से संबंधित कोई प्रकरण वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में लंबित है, तो प्रशासन को उसकी वर्तमान स्थिति और विभागीय कार्रवाई स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण शाखा का दायित्व सौंपने और सम्मानित करने के निर्णय का प्रशासनिक आधार भी सामने आना चाहिए।

प्रशासन पर किसका दबाव

मामला अब केवल सम्मान समारोह तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या सम्मान के निर्धारित मापदंडों का पालन हुआ और क्या वास्तविक फील्ड वर्क करने वाले कर्मचारियों का मूल्यांकन किया गया? यदि किसी अधिकारी को लेकर न्यायिक या विभागीय स्तर पर गंभीर प्रकरण लंबित हैं, तो उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और सार्वजनिक सम्मान देने से पहले प्रशासनिक स्तर पर क्या परीक्षण किया गया, या किसी दबाव के चलते मजबूरी में प्रशासन द्वारा सम्मानित किया गया यह चर्चा का विषय बना हुआ है। जबकि संबंधित अधिकारी को पूर्व में जारी आदेश के मुताबिक कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े किये गये थे और अनुबंध समाप्त किया गया था। हालांकि न्यायालय के द्वारा प्रशासन के आदेश पर रोक लगाई थी लेकिन मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है, जिस पर निर्णय आना बाकी है। बावजूद इसके अनदेखी कर सार्वजनिक तौर पर सम्मानित करना समझ से परे है।

तकनीकी और मैदानी अमले की अनदेखी क्यों?

जल संरक्षण जैसे अभियान की सफलता केवल फाइलों और बैठकों से नहीं होती। इसके पीछे गांवों तक पहुंचने वाला मैदानी अमला, उपयंत्री, सहायक यंत्री, पंचायत कर्मचारी और अन्य कर्मचारी लगातार काम करते हैं। यदि इन कर्मचारियों ने लक्ष्य हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तो उनकी अनदेखी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गलत संदेश है। सम्मान उस व्यक्ति का होना चाहिए जिसने वास्तव में काम किया है और चयन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। जल संरक्षण में डिंडौरी को पहचान दिलाने वाले मैदानी कर्मचारियों की अनदेखी और दूसरी ओर उसी अभियान के नाम पर एक अधिकारी को सम्मान दिए जाने के बीच उठे सवालों का जवाब अब प्रशासन को पारदर्शिता के साथ देना चाहिए। सम्मान का आधार, कार्य का रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारी की न्यायिक विभागीय स्थिति सार्वजनिक करना ही इन सवालों का सबसे बेहतर जवाब होगा।

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