पत्रकारिता या प्रायोजित मौन? तय करिए आपकी कलम किसके साथ है!

पत्रकारिता केवल नेताओं की चापलूसी या उनकी दैनिक आलोचना का नाम नहीं है।
पत्रकारिता सत्ता की प्रेस-रिलीज़ पढ़ देने का व्यवसाय नहीं है।
पत्रकारिता वह अग्नि है जो अंधेरे में रास्ता दिखाती है — और यदि वह बुझ जाए, तो राष्ट्र अंधकार में भटकता है।
देश गंभीर सामाजिक चुनौतियों से गुजर रहा है।समरसता पर चोट हो रही है।जातिगत पहचान-आधारित राजनीति समाज को खांचों में बाँट रही है।ऐसे समय में पत्रकार यदि मौन है,
तो यह मौन तटस्थता नहीं — सहभागिता माना जाएगा।
आज आवश्यकता है उस *पत्रकार* की — जो स्टूडियो की आरामकुर्सी से नहीं, जमीन की सच्चाई से बोले। जो विज्ञापनदाता से नहीं, अपने अंतःकरण से संचालित हो। जो सत्ता से प्रश्न पूछते समय यह न सोचे कि अगला निमंत्रण छिन जाएगा।
निःसंदेह, यदि कोई व्यवस्था समाज में विभाजन को बढ़ावा देती प्रतीत हो,
यदि संवैधानिक ढांचा सामाजिक समरसता की कसौटी पर पुनर्विचार योग्य दिखे, तो उस पर प्रश्न उठाना अपराध नहीं — लोकतांत्रिक दायित्व है। यदि संविधान के कुछ प्रावधानों और नीतिगत परिणामों ने जातिवादी प्रवृत्तियों को खुला मैदान दे दिया है, यदि सामाजिक समानता के स्थान पर जातिगत पहचान आधारित टकराव बढ़ रहा है, तो क्या *पत्रकार* का काम यह पूछना नहीं है —
कहाँ चूक हुई? सुधार की आवश्यकता कहाँ है?
परंतु यदि कोई *पत्रकार* इन प्रश्नों को उठाने से बचता है, यदि वह केवल सुरक्षित विषयों पर बहस करता है,
यदि वह मूल प्रश्नों को छूने से कतराता है —
तो उसे स्वयं से पूछना चाहिए:
क्या मैं प्रहरी हूँ?
- या केवल दर्शक?
देश को आज निडर पत्रकार चाहिए, न कि सुविधाभोगी विश्लेषक।
देश को आज साहसी संपादकीय चाहिए, न कि संतुलित दिखने वाला मौन।
कलम में आग होगी, तो व्यवस्था में जवाबदेही होगी।
कैमरा सच दिखाएगा, तो राष्ट्र जागेगा।
पत्रकार जगत से स्पष्ट आह्वान है
डर से ऊपर उठिए।
सत्य के पक्ष में खड़े होइए।
राष्ट्रहित के प्रश्नों को बहस के केंद्र में लाइए।
अन्यथा इतिहास यह दर्ज करेगा कि जब समाज दिशा मांग रहा था, तब कलम चुप थी।
लेखक,,श्री निवास मिश्रा पत्रकार मैहर










